किसानों को मिले आर्थिक आजादी

अजीत रानाडे,सीनियर फेलो, तक्षशिला इंस्टीट्यूशन
मार्क्सवादी क युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के किसान संगठन, अखिल भारतीय किसान सभा द्वारा आहूत 10,000 किसानों की एक मौन पदयात्रा ने बीते छह मार्च को नासिक से मुंबई की ओर प्रस्थान किया। उनकी मु य मांगें वन अधिकार अधिनियम 2006 के अंतर्गत किसानों को भूमि का स्थानांतरण, उनकी फसलों के लिए बेहतर कीमतें तथा ऋणमाफी पर केंद्रित हैं। जैसे-जैसे यह पदयात्रा मुंबई की ओर बढ़ी, इसमें पूरे महाराष्ट्र से दूसरे किसान भी शामिल होते गए। नतीजतन, मुंबई पहुंचकर उनकी तादाद 50,000 तक हो गई। स्पष्ट है कि इस रैली ने पूरे किसान समुदाय के दुख-दर्द की ही नुमाइंदगी कर डाली। केंद्रीय सरकार के खुद के ही रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले चार वर्षों के दौरान किसानों की आय स्थिर रही है। अलबत्ता, अगले वित्तीय वर्ष के केंद्रीय बजट में यह वचन अवश्य दिया गया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) कृषि लागत से 50 प्रतिशत अधिक तय किए जाएंगे। लगभग इसी वक्त, महाराष्ट्र के आर्थिक सर्वेक्षण से भी यह तथ्य निकल आया कि कृषि क्षेत्र की स्थिति अत्यंत शोचनीय है। 2017-18 में खाद्यान्न उत्पादन 14 प्रतिशत नीचे चला गया है। कपास की रोगग्रस्त फसल ने इस वर्ष 44 प्रतिशत तक कम उत्पादन दर्ज कराया। तिलहन तथा सब्जियों का उत्पादन भी क्रमश: 18 और 14 प्रतिशत नीचे पहुंच चुका है।
पशुधन, पशुपालन और मत्स्यपालन समेत पूरा कृषिक्षेत्र, जिसका इस राज्य के जीडीपी में 12 प्रतिशत का योगदान रहा है, वह इस बार फिसल कर 8.3 प्रतिशत तक जा पहुंचा है। फलत:, जीडीपी की वृद्धि दर 10 प्रतिशत से 7 प्रतिशत पर खिसक आई। महाराष्ट्र एक सुखाड़-प्रवण राज्य है, जहां की ज्यादातर कृषिभूमि पठारी होने के कारण सिंचाई की सीमित सुविधाओं से ही संपन्न है। पिछले वर्ष बारिश में 16 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। साफ है कि महाराष्ट्र की सरकारें यहां की कृषि को सुखाड़-अप्रभावित बनाने में विफल रही हैं, तिस पर तुर्रा यह कि पानी पीनेवाले गन्ने के उत्पादन में 25 प्रतिशत की वृद्धि हो गई। यदि यह मान भी लें कि इसका कुछ हिस्सा ड्रिप सिंचाई जैसे तकनीक उन्नयन की वजह से संभव हो सका, फिर भी यह असंतुलित प्राथमिकताओं का संकेत तो अवश्य ही करता है। महाराष्ट्र की चीनी मिलें सहकारी क्षेत्र में चलती हैं और उन्हें व्यापक सियासी संबद्धता तथा संरक्षण हासिल है।तथ्य यह है कि भारत के संपूर्ण कार्यबल का 50 प्रतिशत से भी ज्यादा अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। आज यह कार्यबल नि न उत्पादन और नि न आय गतिविधि के दलदल में फंसा है. इससे अहम यह है कि इस कार्यबल का भी आधा या तो भूमिहीन है या उसके पास नाममात्र की भूमि है। अत: वे भूमि से बंधे नहीं हैं। यदि इन्हें समुचित विकल्प मिल जाये, तो वे कृषि से खुशी-खुशी खिसक लेंगे। उनके लिए यह विकल्प अनिवार्यत: उद्योग अथवा सेवाक्षेत्र से ही आना है। यह एक ऐसा विराट संसाधन है, जिसका दोहन अभी शेष है। किसानों की यह पदयात्रा एक बार फिर हमें विकास के मु य मुद्दे का सामना करने को बाध्य कर रही है। आजादी के बाद से ही हमने विकास के जिस मॉडल को अपनाया, उसने कृषि को पूरी तरह जंजीरों में जकड़ देने का काम किया। औद्योगीकरण की गति तीव्र करने को खाद्य मुद्रास्फीति की नि न दर को ध्येय मानकर हमने कृषि उत्पादनों की कीमतें हमेशा नि न स्तर पर बनाए रखीं। इसी वजह से पानी, उर्वरक, बिजली तथा बीज जैसे कृषि इनपुटों की लागतों को हम सब्सिडियों की खुराक खिलाते रहे। फिर राष्ट्र के लिए खाद्य सुरक्षा और किसानों के लिए आय सुरक्षा सुनिश्चित करने को हमने अनिवार्य प्रोक्योरमेंट तथा जन वितरण प्रणाली आरंभ की। कुल मिलाकर एक ऐसा ढांचा खड़ा हो गया, जो एक ही साथ विशाल, जटिल और अंतत: प्रबंधन के सर्वथा अयोग्य बन चुका था। तब से ही कृषि विभिन्न बंधनों में बंधी और सहायता, दानों, अनुदानों सहित बचाव पैकेजों पर स्थायी रूप से आश्रित रही है। एक अरसे से विभिन्न कमेटियों, आयोगों तथा अध्ययनों के माध्यम से कृषि के कष्टों की पहचान तथा उनके समाधान की कोशिशें की जा रही हैं, जिनमें सर्वाधिक व्यापक और हालिया रिपोर्ट डॉ एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय किसान आयोग की रही है।
इस पदयात्रा में शामिल किसान भी इस रिपोर्ट को यथावत लागू करने की मांग कर रहे हैं। सच तो यह है कि आज कृषि को इनपुट-आउटपुट की कीमतें, वितरण एवं विक्रय अधिकारों, तथा आयात-निर्यात के नियंत्रणों समेत समस्त बोझिल बंधनों से पूर्णत: उन्मुक्त किये जाने की जरूरत है। दरअसल, कृषि को बगैर किसी अनुदान, दान और बचाव के स्वयं ही स्वावलंबी एवं लाभकारी बनाया जाना बाकी है। हमें एक व्यापक फसल तथा मूल्य बीमा बाजार की भी जरूरत है, जो कृषि के साथ लगे विभिन्न जोखिमों को न्यून कर सके। एमएसपी प्रणाली उसी दिशा में एक कदम है, पर इसे बगैर राजकोषीय बोझ तथा रिसाव के किसानों के लिए लाभप्रद बनना ही चाहिए। किसानों को स्पष्टत: अधिक आर्थिक आजादी की आवश्यकता है।
(अनुवाद:विजय नंदन)

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