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उंची पढ़ाई की, पर झंडे लहरा रहे कृषक बनकर कंपनी समाचार, कृषि, कृषि नीति, ख़बरें, खेत तकनीक, प्रेरक किसान, बाजार, विशेषज्ञ

मलिक असगर हाशमी
इंजीनियरिंग, चार्टड एकाउंटेंट, मास कॉम, एमएससी, एमएड जैसी आला डिग्री लेने वाले जब मनपसंद तनख्वाह की नौकरी की चाह में सड़कों पर भटकते रहते हैं, हरियाणा के ऐसे कुछ युवाओं ने ऐसी राह पकड़ी कि आज वे युवा वर्ग के प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं। इनकी दूरअंदेशी, व्यापारिक प्रबंधन कौशल और वैज्ञानिक सोंच के आज कृषि, बागवानी और पशुपालन विभाग के अला अधिकारी भी कायल हैं। इन युवाओं ने आला दर्जे की पढ़ाई कर खेती-किसानी अपनाई और लाखों-करोड़ों रूपये में खेल रहे हैं। वे युवाओं को नौकरी भी देते हैं । अपने कारोबार को बुलंदी देने के लिए देश-विदेश के विशेषज्ञों की सेवाएं भी ले रहे हैं। कंप्यूटर इंजीनियरिंग करने के बाद विप्रो जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम कर चुके सुखविंदर सर्राफ और अस्ट्रेलिया में बड़ी कंपनी से लंबे समय तक जुड़ी रहीं सीमा गुलाटी की कंपनी आज अपने-आप में ब्रांड बन गई हैं।
नेशनल हाईवे एक से लगते हरियाणा के करनाल जिले की कुटाली गांव की सीमा गुलाटी मशरूम और आर्गेनिक सब्जियों के उत्पादन के लिए जानी जाती हैं। इसके लिए उन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं। ‘एेल्ले मशरूम’- नाम से इनके कई किस्म के मशरूम दिल्ली-एनसीआर के बाजारों में उपलब्ध हैं। विशेषकर मॉल्स के आउटलेट्स में इनकी ज्यादा बिक्री होती है। एमएससी,एमएड करने के बाद लंबे समय तक अस्थायी शिक्ष कार्य कर चुकी सीमा फैशन डिजाइनिंग भी की हुई हैं। बाद में वह आस्ट्रेलिया चली गईं। वहां एक नामचीन कंपनी में काम करने के दौरान अवसाद की शिकार होने पर करनाल वापस आ गईं। फिर मन रमाने को उन्होंने ढाई एकड़ में खेती शुरू की । शुरूआत में उन्होंने गुलाब की नर्सरी लगाई, पर कुछ समय बाद ही उन्होंने इरादा तर्क कर 50 हेक्टेयर में मशरूम और सेमी आर्गेनिक सब्जियों का उत्पादन शुरू कर दिया। इनका कारोबार बढ़ाने में स्थानीय बागवानी अधिकारी मदन कुमार का अहम रोल रहा है। सीमा गुलाटी आज प्रतिदिन 500 किलो विभिन्न प्रकार के मशरूम और तकरीबन एक टन सेमी आर्गेनिक सब्जियां बाजार में सप्लाई कर रही हैं। बीस-पचीस लागों को उन्होंने स्थायी नौकरी भी दी हुई है। सीमा कहती हैं, ‘‘ काम इतना बढ़ गया कि संभालना मुश्किल हो रहा है।’’
इसके बरअक्स, सुखविंदर सर्राफा अपने डेयरी के कारोबार को न केवल विस्तार दे रहे हैं, नितनए प्रयोग कर अपने दूध की पौष्टिकता बढ़ाने में लगे हैं। इसके लिए अपनी डेयरी में एक माइक्रो लैब स्थापित किया है। कंप्यूटर इंजीनियर कुंडली के सुखविंदर बताते हैं कि पशुओं के दूध में प्रोटीन की मात्रा 3.1 फीसदी होती है, जिसे प्रयोग की बदौलत बढ़ाकर उन्हांेने 3.8 कर दिया है। इसके साथ दूध की बैक्टेरियल कॉलोनी की संख्या घटनाने पर भी काम चल रहा है। उनके दावों पर यकीन करें तो दूध में पाए जाने वाले 50 हजार किटाणु की संख्या घटाकर 30 हजार करने में उनकी डेयरी सफल रही है। इनकी डेयरी से प्रतिदिन दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के तीन से चार हजार घरों में पांच हजार लीट दूध सप्लाई होता है। डेयरी चलाने में इनके दो दोस्त पंकज नवाणी और दीपक राज भी पार्टनर हैं। सुखविंदर बताते हैं, विप्रो में काम करने के दौरान उन लोगों के मन में जमीन से जुड़ा कारोबार करने का विचार आया। पहले उन्होंने उत्तराखंड में आर्गेनिक फार्मिंग की योजना बनाई। फिर दूध सोसायटी स्थापित करने का विचार किया। आखिर में उन्होंने डेयरी स्थापित कर शुद्ध दूध सप्लाई करने की योजना पर काम शुरू कर दिया। पूंजीनिवेश के लिए प्रोजेक्ट तैयार कर नीदरलैंड, न्यूजीलैंड सहित तकरीबन बीस देशों के एक्सपर्ट को भेजे गए। अंत में न्यूजीलैंड की एक कंपनी इनके प्रोजेक्ट पर पैसा लगाने को तैयार हो गई। इस दौरान पंकज न्यूजीलैंड में कंपनी के आला अधिकारियों से मिलते रहे और पशुपालन के ट्रिक सीखते रहे। सुखविंदर बताते हैं कि छह वर्ष पहले उन्होंने 50 बछियों के लालन-पालन से डेयरी की शुरूआत की थी। एक साल बाद जब बाछियां दूध देने योग हो गईं तो उन्होंने डेयरी चलाना शुरू कर दिया। अभी इनके पास छह सौ दूधारू पशु हैं। सुखविंदर कहते हैं,पशुपालन हो या कृषि कार्य जब तक आप इससे खुद नहीं जुड़ते कामयाबी असंभव है। वे लोग अपने हाथों से मवेशियों की सेवा करते हैं। डेयरी चलाने के लिए उन्होंने एक्सपर्ट से ट्रेनिंग ली है। न्यूजीलैंड के विशेषज्ञ भी सेवाएं देते हैं।
देशी-विदेशी विशेषज्ञों की सहायता से सीए कर चुकी बहादुरगढ़ जिले के ढांटा खेड़ा गांव की वामिका बोहती ने भी मात्र दो वर्ष में फूलों के अपने कारोबार को बुलंदी पर पहुंचा दी है। इनके ससुर हरिशंकर बोहती बड़े गर्व से बताते हैं कि उनकी बहू दो साल पहले ब्याह कर आने के बाद उनकी जूतों की फैक्ट्री के पीछे फूलों की खेती के खातिर पोली हाउस स्थापित की थी। लगन, मेहनत और नित नए प्रयोगों से आज ढाटा खेड़ी में 19 एकड़ में फूलों की खेती की जा रही है, जिसमें 14 एकड़ नेट और पोली हाउस और तीन एकड़ में खुले में फूलों की खती हो रही है। इसके अलावा शिमला में कार्नेशन फ्लावर के साथ, यूपी-देहरादूर सीमा पर भी फूलों की बागवानी प्रारंभ की गई है। वामिका के पास 16 पोली हाउस हैं। प्रत्येक वर्ष एक पोली हाउस से उन्हें तकरीबन चालीस लाख रूपये का मुनाफा होता है। इसके अलावा उन्होंने बीज रहित बैगन, शूगर फ्री चाय पीने वालों के लिए स्टीवा लीव और खड़ी खेती पर भी काम प्रारंभ कर दिया है। फूलों की खेती का हुनर सीखने के लिए वामिका सिंगापुर, पुणे, बंेगलुरू आदि जाती रहती हैं। अब इज्राइल जाने वाली हैं। वह बताती हैं कि हर दो से तीन दिनों पर इनके पोली हाउस से एक ट्रक फूल निकलता है। इनके उत्पाद ज्यादातर दिल्ली-एनसीआर, जयपुर, जोधपुर, चंडीगढ़ और स्थानीय मैरेज हॉल में सप्लाई होते हैं। लोग खुद फार्म हाउस से फूल ले जाते हैं, इसलिए इनके सामने कभी बाजार का संकट नहीं रहा। वामिका बताती हैं कि अभी वह अपने कारोबार को विस्तार देने पर काम कर रही हैं।
एमए मास कॉम कर चुके कुरूक्षेत्र मबाना के रवि और इनके आस्ट्रेलिया रिटर्न भाई अश्विनी कल्याण भी हरियाणा के युवाओं के लिए बेहतर उदाहरण हैं। उन्होंने आला व्यवसायिक पढ़ाई करने के बावजूद डेयरी कारोबार अपनाया। रवि ने पांच वर्ष पहले आठ गायों से डेयरी की बुनियाद रखी थी। इसके बाद अपनी डेयर के दूध से बनी लस्सी,दूधबादाम शेक स्थानीय मार्केट में आउट लेट बनाकर बेचना शुरू कर दिया। अब फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाने वाले हैं। इनकी शिकायत है कि सरकार थोड़ी सहायता कर दे तो इनका प्लांट बड़े पैमाने पर युवाओं को रोजगार देने के काबिल बन सकेगा। इनकी डेयरी से अभी प्रतिदिन चार सौ लीटर दूध सप्लाई होता है। पिता और भाई के साथ मिलकर यह मक्की, जैव, ज्वार के मिश्रण से निर्मित खास तरह का पशु चारण और बीज बनाने के कम में जुटे हैं।
गुरूग्राम के पालम विहार की कृष्णा यादव, झांडली कलां फतेहाबाद के सुरेश कुमार और कुरूक्षेत्र धनौर जाटान के गुरमेल सिंह भी अपनी बढ़ाई और मिजाज से विपरीत बागवानी, अचार निर्माण और मधुमक्खी पालन के क्षेत्र में नजीर बने हुए हैं। इंजीनियरिंग कर चुके सुरेश कुमार 300 बक्सों से शहद उत्पादन कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कई लोगों को अपने फर्म में नौकरी दी हुई है। इनकी सालाना आमदनी आठ से दस लाख रूपये है। गुरमेल सिंह पिछले चार वर्षों से बेमौसमी सब्जियां टमाटर, शिमला मिर्च, खीरे आदि के उत्पादन में लगे हैं। उन्होंने 2012 में बैंक से लोन लेकर सब्जी उत्पादन कार्य प्रारंभ किया था। आज इनकी सालाना आमदनी लाखों मंें है। गुरूग्राम के पालम विहार की कृष्णा यादव के आचार-मुरब्बे का कारोबार सालाना दो करोड़ रूपये के पार कर गया है। इनका उत्पाद ‘श्रीकृष्ण पिकिल्स’ के नाम से बाजार में उपलब्ध है। इनके पुत्र जितेंद्र यादव बताते हैं कि उन्होंने प्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष तौर पर 400 लोगों को रोजगार दिया हुआ है। हरियाणा के कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ कहते हैं कि इन किसानों ने कई मायने मंें सूबे की प्रगतिशील खेती की तस्वीर राष्ट्र स्तर पर पेश की है। इनकी मदद से दूसरे युवाओं को प्रेरित किया जा रहा है कि वे नौकरी के पीछे भागने की बजाए उन्नत खेत अपनाकर रोजगार देने वाला बनें।’’

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