कीटनाशक दवाओं के बाजार में विदेशी माल का बढ़ता दबदबा…किसानों को चुकानी पड़ रही उंची कीमत

राजेश अभय
कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों के संगठन ने कीटनाशकों के लिए आयात पर बढ़ती निर्भरता पर चिंता जताई है। उसका कहना है कि आयातित कीटनाशकों में प्रयुक्त होने वाली दवाओं के पंजीकरण की आवश्यकता खत्म होने से देश में कीटनाशकों का आयात तेजी से बढ़ा है। इससे घरेलू विनिर्माताओं के लिए समस्या उत्पन्न हुई है और किसानों आयातित रसायन के लिए महंगा दाम चुकाना पड़ रहा है।पेस्टीसाइड मैनुफैक्चरर्स एंड फार्मूलेटर्स एसोसिएशन आफ इंडिया के अध्यक्ष प्रदीप दवे ने कहा कि संप्रग शासनकाल के दौरान वर्ष 2007 में कीटनाशकों में प्रयुक्त होने वाली दवाओं का विवरण के सेंट्रल इंससेक्टेसाइड बोर्ड के साथ पंजीकरण की अनिवार्यता को खत्म कर दी थी। केवल कीटनाशक दवा का पंजीकरण करने की व्यवस्था को बरकरार रखा गया जहां से सारी समस्या उत्पन्न हुई है। दवे ने कहा कि भारत में कीटनाशक क्षेत्र वर्ष 1968 के इंसेक्टेसाइड कानून से संचालित होता है। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था के कारण भारतीय कंपनियां के लिए कीटनाशकों का उत्पादन करना मुश्किल हो गया है क्योंकि इसमें कीटनाशकों को तैयार करने के लिए लगभग पांच छह साल लगते हैं और भारी मात्रा में आंकड़ों को एकत्रित करना होता है। साथ ही कंपनियों पर इस काम के लिए 250 से 300 करोड़ रुपये का खर्च आता है। जबकि विदेशी एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास ये आंकड़े तैयार होते हैं। इसके अलावा उनके पास 20 साल तक का पेटेंट भी होता है जिसके कारण दूसरी कंपनियों के लिए उसकी नकल पेश करने में कानूनी अड़चनें आती हैं। उन्होंने कहा कि इस स्थिति में विदेशों से आयात होने वाले कीटनाशकों और उसमें प्रयुक्त अवयवों की गुणवत्ता को सुनिश्चित करना मुश्किल हो गया है जिसके परिणामस्वरूप विदेशी कंपनियां अनाप शनाप रसायनों का इस्तेमाल कर रही हैं क्योंकि अब उन्हें टेक्नीकल का पंजीकरण नहीं कराना होता है। इसके कारण किसानों को कम उपज मिल रही है लेकिन फिर भी अपने फसलों की रक्षा के लिए वे महंगे दामों पर विदेशी कीटनाशकों को खरीदने के लिए विवश हैं।

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