कृषि आधुनिकीकरण में कॉरपोरेट घराने की हिस्सेदारी नहीं

कृषि प्रधान प्रदेश हरियाणा के 90 लाख हेक्टेयर में खेती होने के बावजूद कृषि कार्यों एवं इसके उत्पादों को उन्नत बनाने में किसी कॉरपरेट घराने की अब तक न कोई हिस्सेदारी रही है और न ही दिलचस्पी। किसानों और प्रदेश सरकार की तरह यह वर्ग भी गेहूं, चावल के उत्पादन को घाटे का सौदा मानता हैं, इसलिए कुछ क्षेत्र में कान्ट्रैक्टर फार्मिंग से आगे इस वर्ग ने सोंचा ही नहीं। औद्योगिक संगठन एसोचैम के डायरेक्टर दिलीप शर्मा कहते हैं,‘‘कॉरपोरेट घराना कोई भी काम बिना लाभ-हानि के नहीं करता। प्रदेश सरकार की ऐसी नीति नहीं कि हरियाणा में कृषि कार्यों के आधुनिकरीकरण में हिस्सेदारी उन के लिए मुनाफे का सौदा साबित हो।’’ कॉरपोरेट सेक्टर छोटे-छोटे जोत पर पैसे नहीं लगाता। लंबे वक्त से बार्ली प्रोडक्ट तैयार करने वाली कंपनी के मालिक एवं पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के हरियाणा चैपटर के मुखिया रहे वीके जैन कहते हैं कि ‘‘ सिरसा को छोड़कर बाकी किसी जिले में अधिक लैंड होल्डिंग नहीं है। ऐसे में कॉरपोरेट घराने का कृषि कार्यों में हाथ डालने का मतलब है घाटा उठाना।’’
प्रदेश सरकार की ओर से भी औद्योगिक घराने केा कोई प्रोत्साहन नहीं मिल रहा। इसके कारण सूबे में चलने वाले चार माल्ट प्लांट मंें से एक बंद हो चुका है। गुरूग्राम चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष विकास जैन बताते हैं, ‘‘ सोनीपत में बूस्ट, हॉर्लिक्स के प्लांट हैं, पर उनका किसानों के किसी बड़े वर्ग से कोई ताल्लुक नहीं । कुरूक्षेत्र, थानेसर,करनाल में कई बड़ी राइस इंडस्ट्री हैं, पर वे भी किसानों से उत्पाद खरीदने या कान्ट्रैक्ट फार्मिंग से अधिक दिचस्पी नहीं लेते।’’ अमूल ने गुरूग्राम में प्लांट लगाया है, पर इसका दायरा भी सीमित है। खाद,बीज बनाने वाली देश की नंबर एक कंपनी इफको के हरियाणा के मार्केटिंग हेड डॉक्टर पुष्पेंद्र वर्मा कहते हैं, उनकी कंपनी की ओर से किसानों को खाद, बीज, कुछ खास तरह की मशीनें, मिट्टी की गुणवत्ता के उपयोग के प्रति जागरूक करने के लिए हरियाणा में अभियान चलाए जा रहे हैं, पर अब तक किसी बडे़ प्रोजेक्ट पर कोई बड़ा इन्वेस्टमेंट नहीं हुआ है।’’ हरियाणा के पशुपालन विभाग के महानिदेशक के निदेशक दिलीप शर्मा उदाहरण देकर समझाते हैं, किसी कॉरपोरेट घराने का रोल तभी संभव है जब सरकार की ऐसी पॉलिसी हो। यदि प्रदेश सरकार टमाटर या दूसरी सब्जियों के लिए कुछ गांवों का कलस्टर तैयार कर छोटे प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करे जहां से सूबे के कुछ हिस्से में कॉरपोरेट घराना द्वारा स्थापित बड़े प्लांट में पहुंचाने के बाद प्रोडक्शन और मार्केटिंग की व्यवस्था हो, तभी बात बनेगी। प्रदेश सरकार की ओर से पब्लिक पार्टनरशिप में ऐसा कोई बड़ा प्रोजेक्ट अब तक सामने नहीं आया है।’’ हरियाणा के पशुपालन विभाग के महानिदेशक जीएस जाखड़ मानते हैं, ‘‘इस राज्य में कहने को कृषि उत्पाद को लेकर कई बड़े प्लेयर काम कर रहे हैं दरहकीकत किसानों या कृषि कार्यों के उत्थान में उनका कोई सीधा रोल नहीं है।’’ प्रोसेसिंग यूनिट से जुड़े एसके आहूजा का मानना है कि जब तक सरकार मंडी टैक्स का सरलीकरण नहीं करती, सूबे के कृषि यूनिवर्सिटी और रिसर्च अनुसंधानों की ओर से बड़े आरएनडी और प्रयोगशालाएं स्थापित नहीं किए जाते और थ्रेसर जैसी कृषि कार्यों में उपयोग आने वाली बड़ी मशीनों को किराए पर देने के नाम पर किसानों का दोहन करने वालों पर अंकुश नहीं लगता हरियाणा के कृषि क्षेत्र में किसी बड़े कॉरपोरेट घराने का उतरना असंभव सा है।

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