आजमा कर देखिए….कुक्कुट पालन में मिलेगी राहत और स्वच्छ रहेगा पर्यावरण

गर्मियों में मुर्गी पालन जोखिम भरा काम है और पराली, धान के पुआल और गन्ने के पत्ते स्वच्छ पर्यावरण की राह का बड़ा रोड़ा। मगर थोड़ी सी समझदारी दोनों ही मसलों का हल निकाल सकती है। कृषि वैज्ञानिकों एवं पर्यावरणविदों की मानें तो पुआल, पराली और गन्ने के पत्ते का होशियारी और समझदारी से प्रबंधन कर गर्मियों में कुक्कुट पालन को होने वाले नुक्सान से बचाया जा सकता है, साथ ही फसलों के इन अवशेषों का सही इस्तेमाल कर पर्यावरण को नुक्सान होने से रोका जा सकता है। वैज्ञानिक कहते हैं, फसलों के अवशेष ग्रीष्मकालीन में सूर्य के प्रकाश का बेहतर परावर्तन यानी रिफ्लेशन हैं। इसलिए जहां मुर्गी पालन किया जाता है, उसकी छतों का छाजन पराली, पुआल और गन्ने के पत्ते से करें और छत का निचला हिस्सा ग्रीन पेंट से पेंट कर दें, ताकि छत के नीचे का तापमान नियंत्रण में रहे। फिर देखें मुर्गियां कैसे राहत महसूस करती हैं और आपका कुक्कुट पालन का धंधा बिना किसी अपरोध के कैसे फलता-फूलता रहता है। फसलोें के अवशेषों के बेहतर प्रबंधन से इन्हें जलाने की नौबत नहीं आएगी और पर्यावरण को नुक्सान भी नहीं होगा। राजधानी दिल्ली से सटे प्रदेशों यूपी, राजस्थान और हरियाणा के कई जिले मुर्गी पालन के लिए विख्यात और फसलों के अवशेष जलाकर प्रदूषण फैलाने को लेकर कुख्यात हैं। अवशेषों का यह प्रबंधन इसके लिए जम्मेदार लोगों के लिए कारगार साबित होगा। बस, थोड़ा कर के तो देखिए।

Related posts

Leave a Comment