खेतों से गायब हो गयी कठिया गेहूं की पैदावार

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर समेत समूचे बुन्देलखण्ड क्षेत्र में दैवीय आपदाओं के कहर से कठिया गेहूं के लाले पड़ गये हैं। किसी जमाने में यहां का किसान कठिया गेहूं की पैदावार ही करता था। कम पानी और बिना रसायनिक खाद के पैदा होने वाला लाल रंग का गेहूं (कठिया गेहूं) सेहत के लिये सबसे मुफीद अनाज माना जाता है मगर अब इसकी पैदावार का दायरा सिमट गया है।
गेहूं की तमाम प्रजातियां आने के बाद भी औषधीय गुणों की वजह से बुन्देलखण्ड क्षेत्र के कठिया गेहूं की पहचान देश और विदेश में है। इसे लाल रंग गेहूं भी कहा जाता है जो बिना प्रकृति के भरोसे ही इसका उत्पादन होता है। जोताई कर कठिया गेहूं के बीज डालने के बाद प्राकृतिक तत्वों की मदद से इसकी फसल खेतों में लहलहा जाती है। खास बात तो यह है कि इस अनाज का उत्पादन ऊबड़ खाबड़ जमीन पर होता है। इसकी पैदावार के लिये फसल को सिर्फ एक पानी की जरूरत होती है।
भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष निरंजन सिंह राजपूत ने बताया कि कठिया गेहूं की पैदावार करने से किसान इसलिये पीछे हट गये हैं क्योंकि एक बीघे खेत में सिर्फ डेढ़ कुंतल ही कठिया गेहूं पैदा होता है जबकि गेहूं की अन्य प्रजातियों से एक बीघे खेत में पांच से दस कुंतल तक की उपज होती है। किसी जमाने में कठिया गेहूं की पैदावार हर किसान करता था, लेकिन अब लागत निकालने के लिये किसान कठिया गेहूं की पैदावार करने में रुचि नहीं लेता है।
असाध्य रोगों के लिये रामबाण है कठिया गेहूं
हमीरपुर के आयुर्वेद चिकित्सक डा.दिलीप त्रिपाठी ने बताया कि खांसी, बवासीर और कोलाइटिस जैसी असाध्य बीमारी के लिये यह गेहूं रामबाण होता है। इसका दलिया खाने से मरीज की सेहत सुधरती है। टायफाइड बुखार में भी कठिया गेहूं का दलिया औषधि का काम करता है। कठिया अनाज की रोटियां खाने से पेट सम्बन्धी बीमारी से व्यक्ति महफूज रहता है।
शुगर बीमारी के लिये मुफीद है कठिया गेहूं
कृषि वैज्ञानिक डा.एसपी सोनकर ने बताया कि शुगर बीमारी के लिये कठिया गेहूं बहुत मुफीद होता है। इसका दलिया खाने से शुगर रोग कन्ट्रोल रहता है। आम लोग यदि इस अनाज की रोटियां खाये तो वह न सिर्फ स्वस्थ रहेगा साथ ही पेट में कोई बीमारी नहीं जन्म लेगी।
दो फीसदी होती है कठिया गेहूं की पैदावार
हमीरपुर के जिला कृषि अधिकारी सरस तिवारी ने सोमवार को बताया कि जनपद में कुछ ही किसान कठिया गेहूं की पैदावार करते हैं। यह फसल वहीं होती है जहां नदियों के किनारे ऊबड़ खाबड़ खेत होते है। बिना रसायनिक खाद के यह फसल दो फीसदी ही किसान कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि पैदावार कम होने की वजह से कठिया गेहूं काफी महंगा है।

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