‘केला क्रांति’ से बदली जाएगी बिहार की आर्थिक तस्वीर

केंद्र सरकार बिहार को केले की खेती केलिए उपयुक्त मानती है। बड़े पैमाने पर केले की खेती कर इस सूबे और यहां के किसानों की आर्थिक तस्वीर बदली जा सकती है। बस आवश्यकता है तो महाराष्ट्र की तरह बिहार में ‘केला क्रांति’ करने की। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने यह बात बिहार के वैशाली जिले के गोरौल में केला अनुसंधान केन्द्र के शिलान्यास के अवसर पर कहीं।
उन्हांेने कहा कि अक्टूबर, 2016 में राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा को केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय का दर्जा मिलने के बाद वैशाली में केले की खेती करने वाले किसानों की उम्मीदें जगी हैं। अब केंद्र यहां केला अनुसंधान केन्द्र स्थापित करने जा रहा है। यह केन्द्र देश एवं राज्य में केले की खेती, उपज, रकबा विस्तार, पौधे के अन्य भागों के समुचित उपयोग, विभिन्न उत्पाद, विपणन एवं मूल्यवर्धन (वैल्यू एडिशन) को लेकर अनुसंधान करेगा।
उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के किसान 26 सरकारी समितियों के माध्यम से घरेलू बाजार विकसित कर विदेशों में केला निर्यात कर देश को नई दिशा दे रहे हैं। महाराष्ट्र केले की सघन खेती, टीशू कल्चर, टपक सिंचाई आदि का उपयोग कर 12-15 हजार रेलवे वैगन प्रति वर्ष उच्च गुणवत्तायुक्त केला देशभर में भेज रहा है।
भारत में केले का कुल उत्पादन 14.2 मिट्रिक टन है। अपना देश केला उत्पादन में दुनिया में प्रथम एवं रकबा में तीसरा स्थान रखता है। राज्यों में महाराष्ट्र सबसे बड़ा उत्पादक है। इसके बाद तमिलनाडु आता है। महाराष्ट्र में केला उत्पादकता 65.7 टन है जो औसत के हिसाब से राष्ट्रीय उत्पादकता का 34.1 प्रतिशत है। बिहार में केले की खेती 27.2 हजार हेक्टेयर में की जाती है और उत्पादन लगभग 550 हजार टन एवं औसत उत्पादकता 20.0 टने. है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है।

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