डोली गांव देहातों से उठी, दुल्हनें अब विदा होती हैं लक्जरी गाडिय़ों में

शहारी क्षेत्र से नई नवेली दुल्हन को मैके से ससुराल ले जानी वाली डोली जमाने के साथ इतिहास में तब्दील हो चुकी है। इसके साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण अंचलों में भी डोली से विदा करने का रिवाज करीब-करीब खत्म सा हो गया है। डोली से शादी की रस्म अदायगी परक्षावन किया जाता था। महिलाएं एकत्रित होकर मांगलिक गीत गाते हुए गांव के देवी-देवताओं के यहां माथा टेकाते हए दूल्हे, दुल्हन को उनके ससुराल भेजती थीं। एक समाचार एजेंसी की मानें तो, डोली की सवारी भारत में आदिकाल से रही है। पहले राजा महाराजा डोली पालकी की सवारी करते थे। रानियां डोली पालकी से आती जाती थीं। डोली ढोने के लिए छह आदमी की टोली होती थी जो अपने कहारों को बदलते हुए कोसों लेकर जाते थे। समय के साथ डोली की जगह अब लग्जरी गाड़ियों ने ले ली है। वयोवृद्ध समाजसेवी मंगली राम कहते हैं, पहले एक गीत चलता था ‘चलो रे डोली, उठाओ कहार’ अब लोगों के जेहन से भूलता जा रहादूल्हे दुल्हन है। आज के बच्चे डोली को साक्षात देख भी नहीं सकते। कारण अब डोली ढूंढने से भी देखने को नहीं मिलती।
आज के बच्चे डोली के बारेे में जानने के लिये अब डोली को गूगल में सर्च कर या पुरानी फिल्मों को देखकर जानेंगे कि यह डोली है।
देवरिया निवासी और संस्कृत के जानकार पं. विश्वनाथ दुबे ने बताया कि पहले आवागमन का सही रास्ता न होने के कारण डोली का प्रयोग होता रहा था जिसमें डोली को छह लोगों की टीम गीत गाते कोसों दूर शादी के समय दूल्हे दुल्हन को लेकर चलते थे और इस दौरान कही किसी गांव के पास रूककर आराम करने के बाद वे फिर से अपने गन्तव्य की ओर चल देते थे।

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