पड़ोसी के आतंकी ही नहीं चीनी भी बनी मुसीबत, हरियाणा के शुगर मिल बंदी के कगार पर

मलिक असगर हाशमी
पाकिस्तान के आतंकवादी ही नहीं वहां की चीनी भी देश की परेशानी का सबब बनी हुई है। उसने महाराष्ट्र के गन्ना किसानों को तबाह तो किया ही है अब हरियाणा के किसान भी इसकी चपेट में आ गए हैं। पाकिस्तानी चीनी के बढ़ते घुसपैठ से हरियाणा की ग्यारह सहकारी चीनी मिलें बंदी के कगार पर हैं। उनका घाटा बढ़कर 2149 करोड़ 77 लाख पहुंच गया है।
भारत विश्व में ब्राजिल के बाद गन्ना उत्पादन में दूसरा बड़ा देश है। इसके बावजूद सरकार और चीनी मिलें सरप्लस उत्पादन, सब्सीडी, इनसेंटिव और चीनी मिलों द्वारा गन्ना किसानों का बकाया चुकता करने में तबाह हैं। इस मामले में पाकिस्तान हम से चतुर है। पाकिस्तानी शुगरकेन क्रॉप सर्वे चीनी के रोजाना की मार्केट की स्थिति पर नजर रखता है।
इंटरनेशनल न्यूज सर्विस रॉयटर्स के डेविड ब्राउट के मुताबिक, ‘‘पाक की तुलना में चीनी निर्यात के मामले में भारत निरंतर पिछड़ रहा है।’’ अभी पाकिस्तान पांच सौ हजार टन चीनी ईस्ट अफ्रीका, सेंट्रल एशिया और पूरे मीडिल ईस्ट में निर्याता करता है। उसकी चीनी के खरीदारों में हम भी है। भारत का ज्यादा जोर चीनी के बजाए गन्ने के रा मैट्रेरियल के निर्यात पर है। यह अधिकतर ईरान, बांग्लादेश, मलेशिया और इंडोनेशिया में निर्यात किया जाता है।
पाकिस्तानी चीनी भारतीय चीनी से बेहद सस्ती है। अपने देश के थोक बाजार में इसकी कीमत प्रति क्विंटल 3900 रुपये के करीब है, जबकि पाक 450 डॉलर के हिसाब से निर्यात कर रहा है। हरियाणा के सहकारिता मंत्री मनीष ग्रोवर कहते हैं कि ‘‘पड़ोसी देश की चीनी सस्ती होने से हमारी चीनी खरीदने को कोई राजी नहीं।’’ हरियाणा में पिछले साल की 16.70 लाख क्विंटल की तुलना में इस पेराई सीजन में चीनी उत्पादन 18.56 लाख क्विंटल हुआ है। प्रश्न है कि इसे खपाया कहां जाए ?
अंतर्राष्ट्रीय ट्रेडर कमल जैन ट्रेडिंग सर्विस के कमल जैन कहते हैं कि ‘‘भारत सरकार ने चीनी के मामले में एक तरह से पाकिस्तान के सामने हथियार डाल दिए हैं। इसलिए चीनी उत्पादन-निर्यात की समस्याएं दूर करने की बजाए इसके रा मैट्रेरियल के निर्यात पर जोर दे रही है।’’

Related posts

Leave a Comment