सेब का सालाना 3500 करोड़ का कारोबार करने वाले हिमाचल में यह चुनावी मुददा नहीं

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में सेब, दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के लिए चुनावी मुददा नहीं है। देश-दुनिया में बेहतर किस्म के सेब उत्पादन के लिए अलग पहचान रखने वाले हिमाचल में सेब के उत्पादन को विस्तार देने को ऐसा क्या किया जाए कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था को गति मिल सके, दोनों ही दलों के चुनावी एजेंडे में इसका अभाव है।
बुधवार को वरिष्ठ कांग्रेसी सुशील शिंदे की मौजूदगी में कांग्रेस ने अपना घोषणा पत्र जारी किया। इसमें मनरेगा के तहत मजदूरी का रेट बढ़ाने, ग्रामीण क्षेत्रों में सडक़ों की हालत सुधारने, खेल स्टेडियम बनाने और एक लाख रूपये तक किसानों को ब्याज मुक्त कर्ज देने का वाद किया गया, पर सेब के काश्तकारों की स्थिति कैसे सुधरे, हिमाचल में इसके उत्पादन को बढ़ाकर यहां के अलावा दूसरे प्रदेशों के लोगों के लिए रोजी-रोटी का बेहतर साधन कैसे बनाया जाए-कांग्रेस के घोषणा पत्र में इसका कोई जिक्र नहीं। तीन दिन पहले भाजपा ने विधानसभा चुनाव को लेकर कई ऐलान किए। उनमें कई किसानों को लुभाने वाले भी थे। इसके बावजूद सेब के उत्पादन को बढ़ाने के बारे में कोई जिक्र नहीं था। बता दें कि हिमाचल में करीब 1.7 लाख परिवारों के लिए सेवा का उत्पादन आजीविका का मुख्य साधन है। प्रदेश में 1,09,533 हेक्टेयर में सेब के बाग हैं। प्रदेश में फलों की खेती का कुल क्षेत्र अकेले 49 प्रतिशत सेब के बाग वाला है। हिमाचल प्रदेश में सेब का रकबा 1950-51 में 40 हेक्टेयर था। 1960-61 में दायरा बढक़र 3,025 हेक्टेयर कर दिया गया। सूबे के शिमला, कुल्लू, किन्नौर, मंडी, चंबा तथा सिरमौर और लाहौल-स्पीति जैसे आदिवासी बहुल जिलों में सेब की प्रमुखता से खेती होती है। सालाना 3,500 करोड़ रूपये का सेब प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना हुआ है। इसके कारण दूसरे राज्यों के ट्रांसपोर्टरों, कार्टन विनिर्माताओं, नियंत्रित तापमान वाले स्टोर कोल्ड चेन स्टोर, थोक मूल्य फल विक्रेता, फल प्रसंस्करण इकाइयों से जुड़े हजारों लोगों को रोजगार मिला हुआ है। फिर भी इतने अहम मुददे को घोषणा पत्र में खास महत्व नहीं दिया गया। भाजपा और कांग्रेस के घोषणा पत्र में पर्यटन विकास पर अधिक बल है।

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